POETRY • एक ख़्वाब

 हथेलियों से फिसलती रही रेत

और हम ख्वाब महल के देखते रहे


सूरज ढला शाम ढली

और छोड़ गए सब


अचानक सपनों पर पानी फिर गया जैसे

लहरों में बह गया अधूरा वो किला जैसे


मायूस होकर निहारते रहे रेत के टीले

सोचते रहे काश पल दो पल ही सही

पूरा कर लिए होता वह ख्वाब जैसे


अब ना जाने कब होगी वो पहर

वैसी शाम, वो समय ,वो मौसम , वो शहर


हो ना हो इतना वक्त फिर हमारे पास

नयी हो तब ख्वाहिशें, ख्वाबों में रहे ना वो बात


पर तभी रेत के ख्वाब को समतल कर गई एक लहर

मेहरबान तो था चांद ज़मीन पर

और छोड़ सब हम तारे रात में चुनते रहे


हथेलियों से फिसलती रही रेत

और हम ख्वाब महल के बुनते रहे


Written by • ANKIT MEROTHA 

Comments

Popular posts from this blog

POETRY • MY MOTHER ( मेरी मां )

SPEECHES ORATORY (स्वतंत्र भारत, राष्ट्र निर्माण, देश प्रेम )

POETRY • ( LOVE /HOME/LIFE) प्यार घर और जीवन